एस.बी.बी.एम. सोषल फाऊंडेषन की दिनांक 06.12.2013 को स्थापना कर उसका रजिस्टेषन मा. सहायक धर्मदाय आयुक्त कार्यालय, नागपुर मे कीया है. रजिस्टेषन दि. 15ध्05ध्2015 नं महाध्332ध्15ध्(नाग) और दिनांक 29ध्06ध्2015 बी.पी.टी. न थ्.33193ध्नाग किया है.
एस.बी.बी.एम. सोषल फाऊंडेषन संस्था दिनदुर्बल, षोशित, पिडीत, अंध, अपंग, निराधार, आदिवासी, दलित, पिछडा वर्ग, अल्पसंख्यांक और किसान को समर्पित है.
एस.बी.बी.एम. सोषल फाऊंडेषन अंतर्गत वृध्दाश्रम, बालसंगोपन, गौरक्षण, षिबीर, कार्यषाला, जनजागृती, निसर्गोपचार, महीला सषक्तिकरण, व्यसनमुक्ती, अंधश्रध्दा निर्मुलन, स्वंयरोजगार, हरितक्रांती, जलसंवर्धन, वाचनालय, प्रषिक्षण केद्र इन सभी प्रकल्पो पर कार्य कर नागरिकोकी सहायता करणे का संकल्प है.
एस.बी.बी.एम. सोषल फाऊंडेषन व्दारा संचालित ‘‘व्यंकटेष आश्रम‘‘ (अपनो से दुर...अपना एक घर...) कुल 2.5 एकर में फैला है. इसमे वृध्दाश्रम का बांधकाम 22000 चै फुट मे है. 4000 चै फुट का बांधकाम रहणेयोग्य है. नागपुर से 45 किमी दुरी पर व्यंकटेष आश्रम मु.पो. माहुली, माहुली मनसर रोड, तहसिल पारषिवनी जि. नागपुर में स्थित है. उसी प्रकार 12।। ंऔर 80ळ अंतर्गत इन्कम टक्स छुट प्राप्त है.
व्यंकटेश आश्रम (अपनो से दुर...एक अपना घर) षांत और प्रदुशण मुक्त वातावरण में स्थित है. व्यंकटेष आश्रम मे कुल 12 पुरूश और 16 महीलायें है. रहने की एवं खाने के उत्तम व्यवस्था, साफ सफाई की और विषेश ध्यान दिया जाता है. मनोरंजन के लिए टि.वी. भी उपलब्ध है.
हमारा समाज इतना अपंग और कमजोर हो गया है की, केवल दो प्राणि जिनको हम माता पिता कहते है उनकी देखभाल नही कर सकते. उनकी छोटी छोटी जरूरतों को पुरा नही कर सकते. इस ढलती उम्रमे उनको किसी भी चिज की ख्वाईष नही रहती सिवाय बच्चो के साथ रहने की उनका प्यार और अपनापन पाने की. माता पिता अपनी सारी जिदंगी बच्चो का भविश्य संवारने मे लगा देते है वह भी बिना किसी लालच के. मगर आजकाल के बच्चो में इतनी षक्ति नही है की, माता पिता के कुछ गिने चुने वर्शो को वह ठिक ढंग से देखभाल कर सके. आजकल मनुश्य इतना भौतिकतावादी हो गया है की, वो केवल भौतिक सुखो की कामना करता है. उनके सोचने की षक्ति संकीर्ण हो गयी है. भौतिक सुखो के आगे माता पिता को रोडा समझने लगते है. उनकी बुढापे की बिमारी को झेलना पंसंद नही करते. यही बच्चे यह भुल जाते है की, बचपन मे न जाने कितनी ही बिमारीयोकों उनके माता पिताने रोते हसते दुर किया था. और न जाने कितनी ही मुष्किलोके बावजुद उनको अपने सिनेसे लगा रखा था. तथा संतान का यह दायित्व है की, वुध्दावस्था मे माता पिता की सेवा करे तथा उनकी ख्वायिष को पुरा करने की कोषिष करे.